• लेखकीय संघर्ष में कोई बाइपास नहीं होता

    Author(s):
    देविना अक्षयवर
    Contributor(s):
    Pramod Ranjan (see profile)
    Date:
    2022
    Group(s):
    Book Reviewing, Communication Studies, Literary Journalism
    Subject(s):
    Criticism, Literature and society, Book reviewing, Reportage literature, Hindi, Journalists, Indian press
    Item Type:
    Book review
    Tag(s):
    Ranjan, Pramod, 1980-, journalism and social justice, Journalism and literature
    Permanent URL:
    https://doi.org/10.17613/h6z0-w048
    Abstract:
    शिमला और हिमाचल से प्रमोद रंजन का गहरा नाता रहा है। वे अपनी युवावस्था के दिनों में यहाँ जीविका की तलाश में आए थे। पुस्तक का एक बड़ा हिस्सा वर्ष 2003 से 2006 के बीच हिमाचल-प्रवास के दौरान लिखी गई उनकी निजी डायरी है। जैसा कि रंजन स्वयं मानते हैं कि यह उनकी मनःस्थितियों का 'विरेचन' भी है और साथ ही साथ 'तात्कालिक मनोभावों, घटनाओं व परिवेशगत प्रभावों की प्राथमिकी' भी। लेकिन इस प्राथमिकी में उन्होंने जितनी गहराई से समाज-व्यवस्था, मानव-मनोविज्ञान, राजनीतिक पाखंड आदि के अनेकानेक सूक्ष्म बिन्दुओं को दर्ज किया है, वह न सिर्फ़ भाषा के स्तर पर अद्भभुत है, बल्कि एक कालखंड का जीवंत इतिहास भी बन गया है। पाठकों के लिए 'शिमला डायरी' भूमंडलीकृत तथा भूमंडलीकरण के दौर से गुज़रते भारत की कुछ ख़ास झांकियां प्रस्तुत करती है। यह भूमंडलीकरण जितना आर्थिक स्तर पर घटता है, उतना ही सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्तर पर भी। वर्तमान समय में हम इन झांकियों से नज़र नहीं फेर सकते।
    Notes:
    प्रमोद रंजन की किताब 'शिमला डायरी' की समीक्षा
    Metadata:
    Published as:
    Online publication    
    Status:
    Published
    Last Updated:
    3 months ago
    License:
    Attribution

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